कही पे महकता हुआ….

कही पे महकता हुआ सुहाना हुस्न है,
कही पे दर्दे-ए-दिलो का खामोश सा जश्न है… .

कही पे यादोंके, अनकहे फसाने है,
कही पे वादोंके, अनचाहे अफसाने है….

कही पे साथ निभाने की कस्मे है,
कही पे मगर, साथ रहने की रस्मे है….

कही पे हरदफ़ा चमक है, और सवेरा है,
कही पे अंधेरा, हो रहा घना और गहरा है….

कही पे सपनो की बिछायी इक सेज है,
कही पे बरबादी की तरफ चलना, और तेज है…

चुने हुए रस्तो पे जरुरी सा है चलते जाना….
जरुरी है कभी खुदको समझाना,
और खुद ही संभल जाना….

– अमर ढेंबरे